वर्तमान समाज पर मोबाईल/सेलफोन का प्रभाव
डाॅ. मधुलिका श्रीवास्तव, राकेश कुमार तिवारी
सहप्राध्यापक (समाजशास्त्र), शा.ठा.रण. सिंह महाविद्यालय रीवा (म.प्र.)
शोधार्थी (समाजशास्त्र), शा.ठा.रण. सिंह महाविद्यालय रीवा (म.प्र.)
सारांश:-
वर्तमान समाज सामाजिक संबंधों का न होकर सेलफोन अर्थात् मोबाईलफोन का जाल बन चुका है। इसकी उपयोगिता तथा प्रभाव का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सन् 2000 से आरम्भ होकर वर्तमान समय तक के मध्य भारत में सेलफोन का उपयोग समाज के उच्च तबकों से आरम्भ होकर निम्नतम तबकों तक, सरकारी - गैर-सरकारी संस्थानों में, बूढ़ों तथा बच्चों तक सभी में समान रूप से पर्याप्त प्रचलित हो चुका है। इस प्रसिद्धि, प्रचलन तथा प्रयोग ने सचलयंत्र यानि सेलफोन को जहां एक ओर समाज को जोड़ने की एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में स्थापित किया है, वहीं दूसरी ओर यह समाज की चिन्ता का भी विषय बन गया है। आज भारत में लगभग 27 करोड़ मोबाइल फोन उपभोक्ता है। भारत के हर चैथे आदमी के पास मोबाइल फोन है। एक आंकलन के अनुसार भारत में हर घंटे 10 हजार मोबाइल सेट बिक रहें हैं। पिछले ही दिनों मोबाइल फोन उपभोक्ता की संख्या के लिहाज से भारत ने अमेरिका का पीछे छोड़ा है। अब सिर्फ चीन भारत से आगे है। भारत में औसतन एक परिवार में एक से ज्यादा मोबाइल फोन है। एक जमाना था जब मोबाइल फोन का मतलब सिर्फ इतना था कि इससे फोन किया और सुना जा सकता था हालाकि तब भी यह एक आश्चर्य की तरह था क्योंकि इसे हाथ में लेकर कहीं भी आ-जा सकते हैं।1 लेकिन अब मोबाइल फोन का उपयोग बदल गया है। अब सिर्फ फोन करने या सुनने का साधन नहीं बल्कि यह एक साथ कई इलेक्ट्रानिक्स गैजेटर्स का काम करता है।2 अंततः तात्पर्य यह हुआ कि जब हम किसी वस्तु का आवश्यकता से अधिक उपयोग करते हैं तो वह हमारे ऊपर प्रभाव भी अधिक डालता है। मोबाइल फोन का उपयोग भी चाहे कम करें या अधिक वह भी हमारे सामाजिक जीवन को प्रभावित करता है। मनोवैज्ञानिक प्रभाव को यदि जानने की कोशिश करें तो समाज का हर वर्ग मोबाइल फोन के कारण तनाव महसूस करता है। कभी अनावश्यक एस.एम.एस. के कारण तो कभी असमय काॅल के कारण, क्योंकि हम हमेशा किसी भी सूचना के लिए तैयार नहीं हो सकते।
मुख्य शब्द:- मोबाईल/सेलफोन, सामाजिक संबंध, मनोबैज्ञानिक प्रभाव, सूचनातंत्र।
प्रस्तावना
‘‘सूचना तंत्र विश्व की धुरी है। सम्पूर्ण विश्व सूचनाओं के इर्द-गिर्द ही मंडरा रहा है। सत्य एवं प्रमाणिक सूचनाएं ही किसी भी निजी प्रतिष्ठान अथवा सरकारी कार्यालय का आधार है। सूचनाओं का अपना एक विस्तृत क्षेत्र है। सूचनाओं की कोई एक सीमा नहीं है और इसके प्रकार भी असीम है इन सूचनाओं को प्रेषित करने एवं प्राप्त करने के लिए विभिन्न तकनीक एवं आधुनिक यंत्र अपनाएं जाते हैं, तभी हरित क्रांति औद्योगिक क्रांति के बाद सूचना क्रांति का उदय हुआ।3‘‘
‘‘हमारे दैनिक जीवन में भी सूचनाओं का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। सूचनाओं का एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजने के लिए नित नये उपयोग एवं प्रयत्न होते रहें हैं। डाक सेवा, टेलीफोन, रेडियों, टेलीविजन, रडार एवं उपग्रह आदि संचार प्राणाली इन्हीं प्रयत्नों का परिणाम है।4‘‘ इस कड़ी में मोबाइल फोन का नाम आता है। वर्तमान समय मोबाइल क्रांति का समय है। मोबाइल फोन में सूचना का आदान-प्रदान ध्वनि के रूप में ही होता है। टेलीफोन तो किसी एक स्थान पर ही स्थित होता है, जबकि मोबाइल फोन को उसकी सीमा के अंतर्गत हम किसी भी स्थान पर ले जा सकते हैं। टेलीफोन में सूचनाएं तारों से प्रवाहित होती है। जबकि मोबाइल फोन में सूचनाएं अति सूक्ष्म ध्वनि तंरगों के रूप में वायु मंडल में प्रवाहित होती है।5
वर्तमान में विज्ञान की सबसे बड़ी देन है मोबाइल फोन (चलित दूरभाष यंत्र) इस यंत्र ने मानव समाज को चाँद तक पहुँचा दिया है। सर्वप्रथम ग्राह्मवेल ने 1876 में टेलीफोन का अविष्कार किया जो एक वायरलेस से संबंधित था। टेलीफोन के द्वारा व्यक्ति एक स्थान से दूसरे स्थान पर बसे अपने परिजनों से बात कर सकता है, मगर यह सेवा किसी स्थान विशेष तक ही सीमित होता था, क्योंकि यह एक वायरलेस के माध्यम से कार्य करता था। आवश्यकता ऐसे यंत्र की हुई जो स्थान विशेष के दायरे से हट कर कार्य करें तब बेल लेबोरेटरीज के इंजीनियरों द्वारा मोबाइल फोन बेस स्टेशनों के लिए 1947 में सेल का अविष्कार किया गया और 1960 के दशक में बेल लेबोटरीज ने इसे आगे विकसित किया। द्वितीय विश्वयुद्ध और 1950 के दशक में सिविल सेवाओं के दौरान सेना में इस सेल का उपयोग किया गया जिसे रेगिनाल्ड केस्सेंडेन रेडियों टेलीफोन के रूप में प्रदर्शन किया । 10 जून 1969 में पहला वायरलेस फोन अमेरिका में 3449750 नं. पर जारी किया गया।6
मोबाइल फोन के नकारात्मक प्रभाव को देखें तो यह सामाजिक संबंधों में दूरियाँ बढ़ाने में सहायक सिद्ध हो रही है। दुःख हो या सुख व्यक्ति दो मिनट मोबाइल फोन से बात करके ही अपनी सामाजिक जिम्मेदारी का इतिश्री कर देता है। माता-पिता एवं बच्चों से मोबाइल फोन का स्थान सुविधा के कारण उच्च हो गया है जो कि पारिवारिक दूरियाँ बढ़ाने में काफी हद तक पर्याप्त है। कार एवं मोटर साइकिल चलाते समय मोबाइल फोन पर बातें करने से दुर्घटनाएँ बढ़ रही हैं। जिसके कारण पारिवारिक असंतुलन उत्पन्न हो रही है।
मोबाइल फोन से भेजे जाने वाले एस.एम.एस.व्यक्ति के ऊपर मानसिक प्रभाव डालता है। यह एक लत के तौर पर देखा जाता है। कई बार इनकी वजह से दुर्घटना होने की खबरें भी आती है। दाम्पत्य जीवन में मोबाइल फोन पति-पत्नि के बीच किसी तीसरे का आभास दिलाता है। जिस कारण परिवार में कलह के साथ ही तलाक की स्थिति भी बनती है। नई पीढ़ी में संचार का यह साधन, अनेकों बुराइयों को जन्म दे रहा है। झूठ, चोरी, ब्लैकमेलिंग, अश्लील एस.एम.एस., अपहरण एवं अनैतिक आचरण सोचना व करना व्यक्ति के लिए आसान हो गया है।
मोबाइल फोन का आर्थिक प्रभाव भी समस्या का कारण है। बजट से अधिक खर्च मोबाइल फोन के कारण होने लगा है। बच्चों का जेब खर्च केवल मोबाइल फोन पर खर्च होने लगा हैैै। मोबाइल फोन के उपयोग के सकारात्मक प्रभाव को देखें तो मोबाइल फोन ने व्यवसायिक क्रंाति का रंग ही बदल दिया है। सुदूर गाँव से रोजगार एवं शिक्षा के लिए नगर आए बालक-बालिका समय-समय पर अपने परिजनों से बात कर सलाह ले सकते हैं। कामकाजी महिलाओं को घर एवं बाहर दोनों कार्य क्षेत्र में संतुलन बनाए रखना आसान हो गया है। समय पूर्व सूचना प्राप्त हो जाने से समस्या के निराकरण एवं कार्य के संपादन में मदद मिलती है। समाज के उन्नति में मोबाइल फोन मददगार साबित हो रही है। इस प्रकार सामाजिक संबंधों को बनाए रखने में मोबाइल फोन का अपना अलग महत्व है।
शोध साहित्य का पुनरावलोकन
पूर्व साहित्य की समीक्षा से तात्पर्य उन सभी प्रकार की पूर्व अनुसंधानों, पुस्तकों एवं अभिलेखों आदि से है, जिसमें की एक शोधकर्ता को अपनी समस्या के परिकल्पनाओं का निर्माण करने एवं कार्य को आगे बढ़ाने में सहायता मिलती है। प्रस्तुत शोध के लिए शोधकर्ता द्वारा किये गये पूर्व अध्ययन साहित्य का विवरण निम्नानुसार है -
मित्तल और कुमार (2000)7 ने मोबाइल फोन का कृषि पर प्रभाव शोध कार्य करने के उपरांत उन्होंने पाया कि मोबाइल फोन कृषि सेवाओं के रूप में किसानों के बीच जागरूकता पैदा करने में सहायक है। कृषि बाजार में मोबाइल फोन और नेटवर्क की बढ़ती (पैठ) उपयोगी जानकारी एवं अवसर उपलब्ध कराने में सहायक है विशेष रूप से अधिक समृद्धि समय पर मूल्य की जानकारी मिलने से किसानों को लाभ एवं उत्पादन में वृद्धि भी होती है।
सैडी प्लंाट (2001)8 ने मोबाइल फोन का सामाजिक एवं व्यक्तिगत जीवन पर प्रभाव का अध्ययन किया और पाया कि मोबाइल फोनका उपयोग व्यक्ति के सामाजिक एवं आर्थिक जीवन पर अधिक प्रभाव डालता है। मोबाईल फोन सामाजिक संबंधों को अधिक मजबूत बनाने एवं संबंधों में नजदीकियाँ लाता हैं और व्यक्ति की निजी जीवन में हस्तेक्षप भी करता है।
अब्दुल्ला (2003)9 के अनुसार मोबाइल फोन का प्रभाव हमेशा मानव के लिए स्वास्थ्य निहितार्थ के मुद्दों के साथ ही जुड़ा हुआ है। मोबाइल विकिरण पर कैंसर विकसित होने का खतरा दोगुना हो सकता है, इसके इस्तेमाल से मस्तिष्क गतिविधि में वृद्धि, कान के आस-पास नसों को नुकसान हो सकता है। मोबाइल फोन से जैविक प्रभाव भी पड़ सकता है।
ब्रीतोलिनी (2004)10 ने अपने अध्ययन में पाया कि मोबाइल फोन ज्ञान और जानकारी के लिए महत्वपूर्ण घटक है, उत्पादन में वृद्धि के माध्यम से कृषि विकास में तेजी और सुधार के साथ-साथ विपणन और वितरण में भी मोबाइल फोन का सबसे बड़ा योगदान है, हितधारकों के बीच बातचीत की लागत को कम करने तथा उत्पादन चक्र्र में किसानों को मदद भी प्राप्त होती है तथा बिक्री भी समय पर एवं सही कीमत तय होती है।
शाबीमुल्लाह खान (2011)11 ने मदुराई मे मोबाइल फोन के उपभोक्ताओं में कंपनी बदलने की प्रवृत्ति पर अध्ययन किया और पाया कि भारत में हर महीने दस लाख नए मोबाइल फोन उपभोक्ता जुडते हंै। भारत में मोबाइल फोन की अनेक कंपनियाँ हैं। यह कंपनियाँ ग्राहको को अनेक प्रकार की सुविधाएँ प्रदान कर रही हैं लेकिन साथ ही उपभोक्ताओं की भी कई ऐसी समस्याएँ और मंाग है जिन्हे ये कंपनियाँ पूरी नही कर पा रही हैं। जिनसे उपभोक्ताओं में असंतोस का भाव भी उभर रहा हैं। उपभोक्ता पुरानी कंपनियों को बदलकर नयी कंपनी की सेवाएँ ले रहें हैं।
मेटी हेवीरीला (2011)12 ने मोबाइल फोन के फीचरों के चुनाव तथा उसके उपभोक्ता की संतुष्टि पर पडने वाले असर तथा पुनःखरीद में इसकी भूमिका पर अध्ययन किया। इन्हांेने फिनलैंड में पुरुषों के बीच मोबाइल फोन के फीचर के चुनाव में प्राथमिकताओं को तय करने के संबंध में बताया कि बैटरी, टॅाक टाइम को फीचर के चुनाव के वक्त प्रतिभागियों ने सबसे ज्यादा प्राथमिक्ता दी। उपभोक्ताओं ने मोबाइल फोन में व्यवसायिक उपयोगिता, मोबाइल फोन के अन्तर्गत आने वाले सहायक सेंवाएँ, रिंग टोन, गेम्स, डिजाइन, पार्टस तथा मजबूती को अधिक ध्यान दिया तथा इन्ही सब का संबंध पुनःखरीदी से हैं।
विल्सन, रोथमान (2012)13 ने अपने अध्ययन में बताया है कि मोबाइल फोन से दैनिक जीवन में व्यक्ति को मानसिक तनाव का सामना करना पड़ता है, जिसके कारण कार्य क्षमता प्रभावित होती है।
अध्ययन का उद्देश्य
यदि हम कोई कार्य करते हैं तो उस कार्य को करने के पीछे हमारा कोई न कोई उद्देश्य अवश्य होता है। शोध कार्य पूर्ण करने हेतु अध्ययन का उद्देश्य जानना आवश्यक है क्योंकि उद्देश्य ही समस्या के समाधान करने में शोधकर्ता की सहायता करता है। इसी संदर्भ में प्रस्तुत शोध प्रबंध में अध्ययन विषय की प्रकृति के आधार पर निम्नखित उद्देश्य निर्धारित किए गए हैं-ः
1. उत्तरदाताओं का सामान्य विवरण ज्ञात करना।
2. मोबाइल फोन धारकों की सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति को ज्ञात करना।
3. मोबाइल फोन का दैनिक जीवन में उपयोगिता का अध्ययन करना।
4. मोबाइल फोन का सामाजिक संबंधों पर प्रभाव का अध्ययन करना।
5. मोबाइल फोन के मनोवैज्ञानिक प्रभाव को ज्ञात करना।
6. मोबाइल फोन का स्वास्थ्य पर प्रभाव का अध्ययन करना।
परिकल्पना
प्रत्येक अनुसंधान का आधार परिकल्पना ही होती है। वैज्ञानिक अध्ययन परिकल्पना के अभाव में संभव नहीं है। परिकल्पना का तात्पर्य पूर्ण चिंतन से है अर्थात् किसी समस्या के हल के बारे में पहले से अनुमान लगाना ही परिकल्पना होती है। इसी संदर्भ में प्रस्तुत शोध कार्य हेतु निम्नलिखित परिकल्पनाओं का निर्धारण किया गया है:-
1. रीवा नगर में सामाजिक तथा पारिवारिक संबंधों में मोबाईल अर्थात् सेलफोन का प्रभाव अत्यंत व्यापक तथा अंतरंग है।
2. मोबाईल अर्थात् सेलफोन रीवा नगर में समाज के सभी वर्गों में दैनिक जीवन का उपयोगी तथा अनिवार्य अंग है।
3. मोबाईल अर्थात् सेलफोन का प्रभाव रीवा नगर निगम क्षेत्र में समाज के सभी वर्गों में पारिवारिक तथा सामाजिक संबंधों के लिये विघटनकारी सिद्ध हो रहा है।
4. दैनिक जीवन के कार्यों में मोबाइल फोन का उपयोग करने वालों की संख्या में वृद्धि की अपेक्षा कमी हो रही है।
5. मोबाइल फोन के कारण सामाजिक संबंधों में नजदीकियों की अपेक्षा दूरियाँ बढ़ रही हैं।
6. मोबाइल फोन का शारीरिक प्रभाव की अपेक्षा मानसिक प्रभाव अधिक पड़ता है।
शोध क्षेत्र क्षेत्र का संक्षिप्त विवरण:-
प्रस्तुत शोध पत्र का अध्ययन रीवा नगर के संदर्भ में है। यहां के मुख्य निवासियों का मुख्य व्यवसाय कृषि है। यहां की जनसंख्या लगभग 235654 है। रीवा नगर को 4 जोन में विभाजित किया गया है जिसके अंर्तगत 45 वार्ड आते हैं। यह रीवा के हुजूर तहसील के अंतर्गत है। रीवा नगर आर्थिक एवं शैक्षणिक क्षेत्र में अग्रणी है। यह एक औद्योगिक नगरी के रूप में प्रसिद्ध है। यहाँ पर एक अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय स्थित है। इसके अतिरिक्त रीवा नगर में चिकित्सा, वाणिज्य, कला, विज्ञान, आयुर्वेद, अभियांत्रिकी व शिक्षा महाविद्यालय भी स्थित है।
शोध प्रविधि -
ज्ञान के क्षेत्र में शोध कार्य अपरिहार्य है। शोध कार्यों द्वारा उन प्रश्नों का उत्तर जानने का प्रयास किया जाता है, जिनका उत्तर उपलब्ध नही है। उन समस्याओं का समाधान करने का प्रयास किया जाता है जिनका समाधान उपलब्ध नही है। वर्तमान युग में शोध या अनुसंधान का अत्याधिक महत्व है, क्योंकि किसी भी क्षेत्र से संबंधित तथ्यों का प्रमाणीकरण, नवीनीकरण, एवं सत्यापन अनुसंधान के द्वारा ही किया जा सकता है।
तथ्यों का सारणीयन:-
शोध कार्य में रीवा नगर में जनसंचार साधनों के सामाजिक परिवर्तन से सम्बन्धित वास्तविक एवं विश्वसनीय आँकड़ों को प्राप्त करने के लिये प्राथमिक एवं द्वितीयक दोनों प्रकार के आकड़ों को एकत्र कर पूर्ण किया गया है। प्राथमिक आकड़े स्वयं कार्य स्थल पर जाकर मूल स्रोतो द्वारा एकत्र किये गये हैं। जबकि द्वितीयक आंकड़े मोबाईल/सेलफोन से संबंधित विभिन्न प्रकाशित-अप्रकाशित पुस्तकों, शोध पत्र-पत्रिकाओं, समाचार पत्रों, शासकीय प्रतिवेदनों आदि से एकत्र कर प्रयोग किये गये हैं।
उपरोक्त सारणी से स्पष्ट है कि रीवा नगर में मोबाईल/सेलफोन उपयोग करने वाले 50 परिवारों से साक्षात्कार किया गया जिसमें 10 प्रतिशत लोग नौकरी, 30 प्रतिशत लोग अध्ययनरत 20 प्रतिशत कृषि से संबंधित कार्य, 30 प्रतिशत लोग मजदूरी, 10 प्रतिशत लोग अन्य कार्य में लगे हुये है।
उपरोक्त सारणी से स्पष्ट है कि रीवा नगर में मोबाईल/सेलफोन उपयोग करने वाले 50 परिवारों से साक्षात्कार किया गया जिसमें 20 प्रतिशत लोग संयुक्त परिवार में एवं 80 प्रतिशत लोग एकाकी परिवार में रह रहें है।
तलिका क्र0 3 में स्पष्ट किया गया है कि नगरीय समाज में मोबाईल/सेलफोन का प्रभाव मुख्यतः सभी क्षेत्रों में पड़ा है। चिकित्सा के क्षेत्र में 20 प्रतिशत मोबाईल/सेलफोन का प्रभाव पड़ा है। प्राचीन समय में स्वास्थ्य केन्द्रों में हस्तलिखित पंजीयन पर्ची मिलती थी, दवाओं तथा डाॅ डाक्टरों से सीधा संवाद और बीमारियों का इलाज होता था, लेकिन मोबाईल/सेलफोन के प्रभाव के कारण आॅनलाइन पंजीयन पर्ची, तथा एक्सरे-मशीन, सोनोग्राफी द्वारा बीमारियों का पता लगा लिया जाता है। मोबाईल/सेलफोन के कारण स्वास्थ्य केन्द्रों में पारदर्शिता आ गई है। शिक्षा के क्षेत्र में भी मोबाईल/सेलफोन का 20 प्रतिशत प्रभाव पड़ा है। जब से मोबाईल/सेलफोन का प्रभाव पड़ा है तब से आॅनलाइन प्रवेश प्रक्रिया शुरू की गयी है, जिसके कारण प्रवेश प्रक्रिया आसान, पारदर्शी और सुनिश्चित हो गयी है। व्यापार के क्षेत्र में भी मोबाईल/सेलफोन का भी प्रभाव पड़ा है। व्यापार ज्यादातर आमने-सामने से होते थे परन्तु व्यापार के कुछ ऐसे क्षेत्र भी हैं जो मोबाईल/सेलफोन से प्रभावित हुए है जैसे आॅनलाइन शांपिग व्यवस्था किये है।
मोबाईल/सेलफोन का प्रभाव मनोरंजन के क्षेत्र में 20 प्रतिशत पड़ा है प्राचीन समय में ग्रामीण समाज में मनोरंजन के साधन के रूप में लोक कथाएं, कजलियां, दादर, फाग, लोकगीत तथा चैपाल व नृत्य थे। मोबाईल/सेलफोन के कारण इनका स्थान, मोबाइल गेम, टेलीविजन, संगीत ने ले लिया है। फिल्मों ने ले लिया है।
बैंकिंग के क्षेत्र में मोबाईल/सेलफोन का प्रभाव सर्वाधिक 30 प्रतिशत पड़ा है। मोबाईल/सेलफोन के प्रभाव के कारण जहाँ पहले लेन-देने सीधे हाथों द्वारा होकर पासबुक में बनाया जाता था राशि शेश हाथ से लिख दी जाती थी आज कम्प्यूटरों, प्रिन्टरों और गणना मशीन द्वारा लेन-देन किया जाता है। प्रिन्टरों द्वारा पासबुक में जमा और शेष राशि की इंट्री कर दी जाती है। सरकारी कर्मचारियों का वेतन भी जमा होने की जानकारी भी आज मोबाईल पर मैसेज द्वारा आ जाती है। इस प्रकार स्पष्ट है कि ग्रामीण समाज में मोबाईल/सेलफोन का प्रभाव पड़ा है। मोबाईल/सेलफोन के कारण ग्रामीण व्यवस्था में और कार्य करने के तरीकों में भी परिवर्तन आया है।
उपरोक्त सारणी से स्पष्ट है कि रीवा नगर में 50 परिवारों से साक्षात्कार किया गया जिसमें 36 प्रतिशत परिवार में 3-5 लोग है जो मोबाईल/सेलफोन का प्रयोग करते हैं, 40 प्रतिशत परिवार में 5-7 लोग एवं 24 प्रतिशत परिवार जिनमें 7-9 लोग मोबाईल/ सेलफोन का प्रयोग करते है।
उपर्युक्त तालिका के आधार पर युवा वर्ग में मोबाईल/सेलफोन का प्रयोग का स्तर 40 प्रतिशत है तथा वयस्क वर्ग मं 34 प्रतिशत और वृद्ध वर्ग में 25 प्रतिशत यानी सबसे कम वृद्ध वर्ग में मोबाईल/सेलफोन का प्रयोग किया जाता है।
अध्ययन की कठिनाइयाँ एवं निराकरण
मोबाइल फोन एक निजी संपत्ति है। जिसके उपयोग के बारे में विवरण देना या लेना दोनों ही दुष्कर कार्य है। व्यक्तिगत सवाल होने के कारण सही जवाब जानने के लिए अत्यधिक विश्वास में लिया जाना आवश्यक होता है। ताकि सही जानकारी प्राप्त हो सकेे। प्रस्तुत शोध कार्य में उत्तरदाताओं के अध्ययन विषय से संबंधित तथ्य संकलन करने में निम्नलिखित कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
1. तथ्य संकलन के समय सर्वप्रथम उत्तरदाताओं के द्वारा समयाभाव की समस्या उत्पन्न हुई। लेकिन उनसे समय निश्चित करके तथ्यों का संकलन किया गया।
2. मोबाइल फोन उपयोग संबंधी विभिन्न प्रकार की बातें उत्तरदाता नहीं बताना चाहते थे। किन्तु तथ्य गोपनीय रखने की बात जानकर सहयोग देने को तैयार हो गए।
3. मोबाइल फोन से संबंधित आर्थिक, मानसिक एवं सामाजिक बातें बताने में उत्तरदाताओं को एकांत एवं विश्वास की अधिक आवश्यकता हुई जो शोधकर्ता के द्वारा पर्याप्त रूप से दिया गया।
उपसंहार:-
वर्तमान समाज सामाजिक संबंधों का न होकर सेलफोन अर्थात् मोबाईल का जाल बन चुका है। इसकी उपयोगिता तथा प्रभाव का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सन् 2000 से आरम्भ होकर वर्तमान समय तक के मध्य भारत में सेलफोन का उपयोग समाज के उच्च तबकों से आरम्भ होकर निम्नतम तबकों तक, सरकारी - गैर-सरकारी संस्थानों में, बूढ़ों तथा बच्चों तक सभी में समान रूप से पर्याप्त प्रचलित हो चुका है। इस प्रसिद्धि, प्रचलन तथा प्रयोग ने मोबाईल यानि सेलफोन को जहां एक ओर समाज को जोड़ने की एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में स्थापित किया है, वहीं दूसरी ओर यह समाज की चिन्ता का भी विषय बन गया है। इस चिन्ता का प्रमुख कारण सामन्य जन में सेलफोन का अत्यन्त तीव्रता से बढ़ता प्रयोग है। वर्तमान समाज में सेलफोन का प्रवेश हमारे निजी जीवन की अत्यन्त अंतरंगता में बहुत तेज़ी से हुआ है। इस कारण संबंधों को जोड़ने के स्थान पर यह संबंधों को तोड़ने का कारक भी बनने लगा है। इस विषय पर सम्पूर्ण विश्व में समाजशास्त्री समाज को जागरुक करने का प्रयास करने लगे हैं। पारिवारिक तथा सामाजिक संबंधों में दूरियां पैदा करने के साथ ही साथ यह युवा वर्ग में भ्रम तथा आत्ममुग्धता का कारण भी बन रहा है। बच्चों में यह एक तरफ जहां मनोरंजन के स्वस्थ साधनों के प्रयोग को कम करने का खतरा पैदा करता है, वहीं दूसरी ओर माता-पिता के साथ पर्याप्त समय न बिता पाने के कारण एकाकीपन के बोझ को भी बढ़ाता है।
इन मानसिक तथा मनोवैज्ञानिक प्रभावों के अतिरिक्त शारीरिक स्वास्थ्य पर भी मोबाइल के अधिक प्रयोग के दुष्परिणाम देखने में आ रहे हैं। इसका अधिक मात्रा में सा़क्षात् उपयोग न करने वालों पर भी जगह-जगह लगे मोबाइल टावर की विकिरणों के कारण स्वास्थ्य पर कैन्सर जैसी गम्भीर बीमारियों का खतरा मंडरा रहा है। एक ताज़ा स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार कैन्सर का मुख्य कारण मोबाइल टावर से निकलने वाला विकिरण है।
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Received on 10.06.2019 Modified on 18.06.2019
Accepted on 25.06.2019 © A&V Publications All right reserved
Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2019; 7(2):537-543.